अथ श्रीविष्णुपादस्तु तिः यदीयमाश्रितं प ।
दं समस्तपापनाश कम् । स विष्णुरात्मसत्पदे ॥ १ ॥
सुभक्तिमाशु मे दिशे त् यदीयमाश्रितं पदं ।
समस्तविघ्ननाशकम् । स विष्णुरात्मसत्पदे ॥ २ ॥
सुभक्तिमाशु मे दिशे त् यदीयमाश्रितं पदं ।
समस्तदुःखनाशकम् । स विष्णुरात्मसत्पदे ॥ ३ ॥
सुभक्तिमाशु मे दिशे त् यदीयमाश्रितं पदं ।
समस्तपुण्यदायकम् । स विष्णुरात्मसत्पदे ॥ ४ ॥
सुभक्तिमाशु मे दिशे त् यदीयमाश्रितं पदं ।
समस्तसौख्यदायकम् । स विष्णुरात्मसत्पदे ॥ ५ ॥
सुभक्तिमाशु मे दिशे त् यदीयमाश्रितं पदं ।
समस्तभाग्यदायकम् । स विष्णुरात्मसत्पदे ॥ ६ ॥
सुभक्तिमाशु मे दिशे त् यदीयमाश्रितं पदं ।
समस्तशास्त्रबोधकम् । स विष्णुरात्मसत्पदे ॥ ७ ॥
सुभक्तिमाशु मे दिशे त् यदीयमाश्रितं पदं ।
समस्तकर्मसिद्धिदम् । स विष्णुरात्मसत्पदे ॥ ८ ॥
सुभक्तिमाशु मे दिशे त् यदीयमाश्रितं पदं ।
समस्तदेवतोषदम् । स विष्णुरात्मसत्पदे ॥ ९ ॥
सुभक्तिमाशु मे दिशे त् यदीयमाश्रितं पदं ।
समस्तसद्विमुक्तिदम् । स विष्णुरात्मसत्पदे ॥ १० ॥
सुभक्तिमाशु मे दिशेत् यतिः स
त्यात्मपदभागभवद्विष्णुपा ।
दभाक् । तदुक्तपदभाग्यस्तु स
भवेद्विष्णुपादभाक् ॥ ११ ॥
॥ इति श्रीविष्णुपादस्तुतिः ॥